Saturday, September 13, 2025

१८८. श्रद्धामय विश्वास बढाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें |

 १८८.   श्रद्धामय विश्वास बढाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें |


श्रद्धामय विश्वास बढाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें |

अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नवसूर्य उगायें | 

जाग रहा है जन-गण-मन, निश्चित होगा परिवर्तन ||धृ०||


शुद्ध सनातन परंपरामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे | 

ऋषि-मुनीयों की शिक्षाओं पर, चलने का संस्कार रहे |

राह रपटती इस दुनिया में,  कुल-कुटुंब का संरक्षण ||१||


सब समाज अंगांग परस्पर, छुवाछूत लवलेश न हो | 

प्रीती-रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष न हो |

बनें परस्पर पूरक पोषक, हृदयों में रस-धार सृजन ||२||


हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण |

पंचतत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण 

पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परंपरा का करें वरण ||३||


स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी, स्वत्व बोध का ले आधार |

परहित ध्यान परस्पर पूरक, जनजीवन का शिष्टाचार | 

विश्व मंच पर भारत माॅं के, यश की हो अनुगूॅंज सघन ||४||

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