१८८. श्रद्धामय विश्वास बढाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें |
श्रद्धामय विश्वास बढाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें |
अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नवसूर्य उगायें |
जाग रहा है जन-गण-मन, निश्चित होगा परिवर्तन ||धृ०||
शुद्ध सनातन परंपरामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे |
ऋषि-मुनीयों की शिक्षाओं पर, चलने का संस्कार रहे |
राह रपटती इस दुनिया में, कुल-कुटुंब का संरक्षण ||१||
सब समाज अंगांग परस्पर, छुवाछूत लवलेश न हो |
प्रीती-रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष न हो |
बनें परस्पर पूरक पोषक, हृदयों में रस-धार सृजन ||२||
हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण |
पंचतत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण
पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परंपरा का करें वरण ||३||
स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी, स्वत्व बोध का ले आधार |
परहित ध्यान परस्पर पूरक, जनजीवन का शिष्टाचार |
विश्व मंच पर भारत माॅं के, यश की हो अनुगूॅंज सघन ||४||
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