Sunday, December 17, 2023

१७९ महामंत्र हा नवविजयाचा, नव्या युगाचा नव पर्वाचा

 १७९  महामंत्र हा नवविजयाचा, नव्या युगाचा नव पर्वाचा


महामंत्र हा नवविजयाचा, नव्या युगाचा नव पर्वाचा

दाही दिशातुनी घुमते नाम, रामप्रभूचे सुंदर नाम ।

जय श्रीराम जय श्रीराम ॥धृ०॥

नवे पर्व हे हिंदुत्वाचे, संघशक्तिचे शिवशक्तीचे 

हिंदुमनांचा स्वामी राम, गंगेसम हे पवित्र नाम ।

जय श्रीराम जय श्रीराम ॥१॥

धर्म राखुया इथे निरंतर, खलप्रवृत्ती नुरो धरेवर

पुरुषार्थाचे मंगलधाम, रामप्रभूचे सुंदर नाम ।

जय श्रीराम जय श्रीराम ॥२॥

जीर्ण जातसे जेव्हा जळुनी, नवे येतसे सहज उजळुनी

छत्रपतींच्या स्वप्नांतले, हिंदूंचे हे सुवर्णयुग ये,

मुखी घेऊनी पवित्र नाम, जय श्रीराम जय श्रीराम ॥३॥

मंदिर बांधले जन्मभूमीवर, पराक्रमाने विशाल सुंदर

नवविजयाचा मार्ग दाखविल, जनशक्तीचा मंत्र महान ।

जय श्रीराम जय श्रीराम ॥४॥

लोकशाहीचा आद्य प्रणेता, सुजनशक्तिचा भाग्यविधाता

हिंदू युगाचा नायक राम, हिंदूंचा हा पंचप्राण ।

जय श्रीराम जय श्रीराम ॥५॥

१७८ सद्विचार की नीव हमारी, शिव संकल्पित आज बनें

१७८  सद्विचार की नीव हमारी, शिव संकल्पित आज बनें 


सद्विचार की नींव हमारी, शिव संकल्पित आज बनें 

ईश्वरीय है कार्य हमारा, निमित्त बन हम कार्य करें ||धृ०||

हमे पता है मार्ग हमारा, कंटकमय और दुर्गम है 

विश्वास सदा रहा है मन में, यही हमारा संबल है 

चलते चलते लक्ष्य प्राप्ति हित, मार्गक्रमण हम करते हैं ||१|| 

सत्ता पद की चकाचौंध में, मार्ग कहीं हम ना छोडे 

साधन को ही साध्य मानकर, ना भूलें और ना भटकें 

ना हम थकते, ना हम रुकते, मार्गक्रमण हम करते हैं ||२||

धन्य हुआ है जीवन अपना, मातृभूमि की सेवा में, 

भारत हि है ईश्वर अपना, पूजा के हम दीप बने 

राष्ट्रयज्ञ के साधक बनकर, मार्गक्रमण हम करते हैं ||३|| 

Saturday, July 8, 2023

१७७ भगवा लहर लहर लहराए

१७७. भगवा लहर लहर लहराए

भगवा लहर लहर लहराए,
त्याग शौर्य संदेश सुनाये ||धृ०||

पूर्व दिशासे किरणे फैले
जग को ज्योतिर्मय कर डाले
भगवत ध्वज की दिव्य प्रभा को
हम सब प्रतिदिन शीष नमाए ||१||

अरुणिम स्वर्णिम रंग जमाये
धर्मं भावना सतत जगाये
त्याग तपस्या बंधु भावना
हम सब जीवन में अपनाए ||२||

विश्वगुरु यह भगवत् ध्वज है
विश्व में जय का यह प्रतीक है
वैभव के अति उच्च शिखरपर
भारत को फिरसे पहुंचाये ||३||

Sunday, June 11, 2023

१७६. हिंदूभूमिच्या परमवैभवा प्रगटविण्या साकार

 १७६. हिंदूभूमिच्या परमवैभवा प्रगटविण्या साकार  


हिंदूभूमिच्या परमवैभवा प्रगटविण्या साकार  

समर्थ होऊन राष्ट्र भरू दे स्वत्वाची हुंकार ||धृ०||

पोषण होवो तनामनांचे अशी हवी समृद्धी

अन लाभो सकलास त्यासवे निरामयाची सिद्धी 

संस्कारातून राष्ट्र भावना उपजावी अनिवार ||१|| 

स्वयंपूर्ण हो समाज हा अन स्वावलंबि हो व्यक्ती

समाजभक्ती रुजो मनांतुन अशी घडो अभिव्यक्ती

व्यष्टी समष्टी एकत्वाचा घडो नित्य संस्कार ||२|| 

जोडुन ठेवी चराचरा जो धर्म सनातन इथला 

आज आपुल्या आचारातुन जगता दाउ चला 

दिव्य अशा युगधर्माचा हो पुनश्च साक्षात्कार ||३||

हिंदू हिंदू एकात्म करावा स्नेह अर्पुनी शुद्ध 

समर्थ भारत आज घडविण्या संघ शक्ती हि सिद्ध 

सामर्थ्यास्तव संघटनेचा घडु दे अविष्कार ||४||

Tuesday, August 16, 2022

१७५ . गुरु वंद्य महान

 १७५ . गुरु वंद्य महान

गुरु वंद्य महान भगवा एकचि जीवन प्राण
अर्पण कोटी कोटी प्रणाम ॥ध्रु०॥


शोणित वर्णामधुनी शिकलो सारे उज्ज्वल त्याग
व्यापित आलो दिव्य दृष्टिने अखंड भारतभाग
बघुनी फडफड देशभक्तिची भडके अंतरि आग
कटिबद्ध उभे तव छत्राखाली भारतभूसंतान ॥१॥


शौर्याने तव जगी गाजला स्फूर्तिप्रद इतिहास
पाहिलेस निज नेत्रांनी किति भीषण रणसंग्राम
देहदंड कुणि हाल भोगिले केले निज बलिदान
बलिदान नव्हे ते पूजन केले राखाया सन्मान ॥२॥


ऋषी तपस्वी महामुनींचा संतांचा अभिमान
अनादिकालापासुनीच तुज अग्रपुजेचा मान
बघशिल भावी भाग्यपूर्ण अन्‌ उज्ज्वल वैभवकाळ
हो यशस्वी असे सुमंगल दे शुभ वरदान ॥३॥


शुद्धशीलता चारित्र्याची पावित्र्याची खाण
अभय वीरता शौर्य धीरता संयम शांतिनिधान
सद्भावे तुज आम्ही मानिले पूज्य गुरु भगवान
परमपावना तव पदि वाही देशास्तव हे प्राण ॥४॥

Thursday, March 31, 2022

१७४ . परम वैभवी भारत होगा

 १७४ .  परम वैभवी भारत होगा


परम वैभवी भारत होगा,  संघ शक्ति का हो विस्तार 

गूंज उठे, गूंज उठे, भारत माँ की जय जयकार 

भारत माँ की जय जयकार ।।धृ।।


व्यक्ति और परिवार प्रबोधन, समरसता का भाव बढ़े

नित्य मिलन चिन्तन मंथन से, संगठना का भाव जगे

इसी भाव के बल से गूंजे,  देशभक्ति की फिर हुंकार  ।।१।।


हो किसान या हो श्रमजीवी, सैनिक या व्यवसायी हो

अध्यापक विद्यार्थी सेवक,  या जनजाती भाई हो 

उद्यमिता और स्वावलम्बिता, शिक्षा में हो ये संस्कार ।।२।।


हिन्दू संस्कृति कि संरचना, मानवता का रक्षण हैं

जीवदया सृष्टि की पूजा, यह स्वभावगत लक्षण हैं 

शुद्ध गगन पानी माटी से, निर्विकार बन बहे बयार ।।३।।


शुभ परिवर्तन करने को अब, हम ऐसा संकल्प करें 

अखंड भारत का वह सपना, सब मिलकर साकार करें 

बाधा कोई रोक न सकती, जन्मसिद्ध अपना अधिकार ।।४।।

Tuesday, October 27, 2020

१७३ . विजिगिषा की गन्ध लेकर, चेतना विकसित हुई है

 १७३ . विजिगिषा की गन्ध लेकर, चेतना विकसित हुई है  


विजिगिषा की गन्ध लेकर, चेतना विकसित हुई है 

शक्ति की आराधना की, भावना जगने लगी है ||धृ० || 


पर्वत औ घाटियों में, कुछ जगीं नूतन ऋचाएँ

महमहाकर फिर उठी है, देश की पावन कथाएँ

दे रही आह्वान कितनी, पूर्व-पुरुषों की व्यथाएँ

विजय का जय गान लेकर, आ रही केशर हवाएँ

कुछ नये सामर्थ्य का फिर, भाव प्रकटा हर डगर में

देखकर व्यापक उजाला, सुप्त कलियाँ खिल रही है॥१॥


आज पौरुष के नये स्वर, गुनगुनाते जा रहे है

आज के स्वर हर ह्रदय को, स्पर्श करते जा रहे हैं

हर नवीन उल्लास में हम, स्वर्ण-जीवन पा रहे हैं

आज के हर शब्द जीवन, छन्द रचते जा रहे हैं

ज्योति गरिमा जग रही है, हर मनुज के श्रान्त मन में

हिन्दुता फिर विजयता की, अर्चना करने लगी है॥२॥


रामशक्ति जागृता जब, वानरि अक्षौहिणी

ले चली है जय पताका, कृष्ण की नारायणी

संगठित फिर देव शक्ति, असुर वंश विनाशिनी

शक्ति की साकार यमुना, धर्म की मंदाकिनी

ज्ञान रवि का तेज बिखरा, हर्ष छाया जन ह्रदय में

राष्ट्र शंभू विश्व-पूजित, अस्मिता सजने लगी है॥३॥